सुना था कुछ तो होती है कशिश
सुना था कुछ होता है... खीचता है जो दिल को
ये जाना जब तुमने झुकी पलकों को उठा के देखा
ये माना जब खुद ही खीचने लगे उस झील की राहों में
दोस्त पूछ रहे हैं क्यों दीखते नहीं
रहते हो क्यो खोए खोए
क्या बताओं झील किनारे क्यो बैठा हूँ
कैसे कहूँ उस झील से क्या नाता है
तुमने पलकें उठायी मुस्कुरा के देखा और चल दी
पर हम आज भी झील किनारे बैठे हैं.....

